Monday, February 18, 2013

मुल्लाह बनाम केंचुआ Mullah V/s Earthworm





मुल्लाह, साधु, पंडित, पादरी  आदि का मौजूदा मानव समाज के रचनात्मक विकास में केंचुए के योगदान से भी कम है. वह मिट्टी की उर्वरा को उन्नत ही नहीं करता वरन हजारो पक्षियों का पसंदीदा भोजन भी है. ओरगेनिक खेती ने केंचुओ की महत्ता को और अधिक स्थापित कर दिया है. पर्यावरण के संतुलन को कायम रखने में केंचुए की महती भूमिका है. लेकिन मुल्लाह, साधु, पादरी या पंडा इनका समाज के विकास में क्या योगदान है? इनके जीवन से क्या किसी देश की मिट्टी कभी उर्वरक हुई है ? क्या किसी देश के सकल उत्पाद में इनका कोई योगदान है? ये मात्र परजीवी है, फिलीपींस से लेकर अमेरिका जहां भी ये प्रजाति पायी जाती है इनके श्रम से कोई रचनात्मक उत्पादन कभी नहीं हुआ, इनसे बेहतर पृथ्वी पर केंचुए हैं जो इंसान के लिए एक बेहतर वातावरण तैयार करने में रात दिन जुटे हुए है. एक प्रबुद्ध समाज दाढ़ी की लम्बाई/तिलक की चौढ़ाई को के बरक्स उस व्यक्ति की  आर्थिक उपादेयता और उसके सामाजिक सरोकारों को महत्व देगा. मुल्लाह-पंडित-पादरी पालने से बेहतर है केंचुओ को पाला जाए, वह हर मायने में ज़्यादा मुफीद साबित होगा.

Beautiful earth worm is more productive than Mullah, Sadhu, Pastor or Pundit. It not only enriches the soil but most liked staple food for thousands of bird species. Organic farming has reinforced the importance of earth worm. Earth worm plays a vital role in maintaining the ecological balance of our planet. But what is the positive contribution of these Mullah, Pastors, Sadhus and Pundit in our social development? Has their presence ever improved the productivity of the soil in any country? Do they contribute anything in GDPs of any nation? They are just parasites. From Philippine to United States wherever they are found, has never contributed anything productive so far. I rate an earth worm better than these parasites that are creating positive conditions for human life. A just society will always recognise the services of a human being in terms of his economic and social contribution not by the length of his beard or wide Tilak at forehead. It would always be a better idea to pet few earth worms rather than giving alms to parasites of the society.

फोटो सौजन्य : गूगल/ Photo arrangements: Google                  

Wednesday, January 2, 2013

अकबरुद्दीन औवेसी :भारतीय राज्य को चुनौती देता ठाकरे का मुस्लिम संस्करण


हबीबे मिल्लत 42 साला विधायक अकबरुद्दीन औवेसी पुत्र मरहूम सांसद सालारे मिल्लत सलाहुद्दीन औवेसी इन दिनों अपनी जज़्बाती ठाकरे अंदाज़ वाली तकरीर के कारण भारतीय मीडिया, सोशल मीडिया की सुर्खियों में हैं। 24 दिसंबर को आदिलाबाद में कोई 10-15 हजार मुसलमानों की भीड़ को संबोधित करने के बाद मुसलमानों के प्यारे (हबीबे मिल्लत ) ने इलाज कराने के नाम पर लंदन का जहाज पकड़ लिया। नेता,मीडिया, सरकार, भाजपा, अदालत सब हरकत में आ चुके हैं। अकबरुद्दीन की ही माने तो भारत में 25 करोड़ मुसलमान है इनकी सियासी जमात इत्तेहादे मुसलमीन (एम आई एम ) के कुल जमा 7 विधायक हैं और इनके बड़े भाई असद्दुदीन अपने पिता सलाहुद्दीन की पुश्तैनी संसदीय सीट से भारतीय लोकसभा के निर्वाचित सांसद भी हैं। हैदराबाद से सलाहुद्दीन औवेसी 6 बार सांसद रहे जिनका स्वर्गवास 2008 में 77 साल की उम्र में हुआ था। अब आप इन सालारे मिल्लत, हबीबे मिल्लत की सियासी औकात का अंदाजा खुद ही लगा सकते हैं।
मुसलमानों के इस अशरफ नेता, इनकी सियासी तंजीम के इतिहास का परिचय करना यहाँ आवश्यक है, अतीत से वर्तमान को समझने में पाठकों को आसानी होगी। हैदराबादी मजलिस का इतिहास भारत की आज़ादी से भी पुराना है। भारत की आज़ादी से पूर्व निजाम हैदराबाद उस समय भी दुनिया का सबसे अमीर आदमी था। निज़ाम हकुमत की अपनी रेलवे, डाक सेवा, संचार, जहाज रानी, एयरलाइन फ़ौज थी। हकुमत की जी डी पी बेल्जियम के बराबर थी।निज़ाम के पास 22,000 फौजियों की सेना थी जिसमे अरब,पठान, रोहिल्ले आदि शामिल थे। निज़ाम ने भारत में विलय करने से इंकार कर दिया था सितम्बर 1948 तक कई वार्ताओं के दौर चले लेकिन निज़ाम टस से मस न हुए। निज़ाम की निजामशाही के खिलाफ़, उसके जमीदारों के खिलाफ आज़ाद भारत में आम जनता का पहला संगठित विद्रोह हुआ जिसका नेतृत्व भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने किया था। उन दिनों मजलिस हुआ करती थी जिसका नेता कासिम रिज़वी था। भाड़े के सैनिकों को रखने में माहिर निजाम की हकुमत बचाने (इस्लाम की हिफ़ाजत पढ़े) के लिए कासिम ने निजाम के आदेश पर एक मिलिश्या का गठन किया जिसे 'रजाकार' के नाम से जाना जाता है। इसकी तादाद उन दिनों 2 लाख तक बतायी जाती है। आम मुस्लिम आबादी पर कासिम की पकड़ भी इस संगठन के जरिये समझी जा सकती है। उस ज़माने में कासिम की तकरीरें और अकबरुद्दीन की तकरीरों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है, बस कुछ तात्कालिक मुद्दे और जुड़ गए हैं। कासिम रिज़वी ने रजाकारों को भारतीय फौजों के खिलाफ लड़ने के लिए वही दलीलें दी थी जो अकबरुद्दीन ने दी है। बारहाल निज़ाम की हकुमत को 17 सितंबर 1948 में पांच दिन का भारतीय फ़ौजी अभियान 'आपरेशन पोलो' उर्फ़ पुलिस एक्शन के सामने घुटने टेक देने पडे। निजाम के अरब कमांडर अल इदरूस को जनरल चौधरी के सामने समर्पण करना पड़ा। इस लड़ाई में भारत के 32 फ़ौजी मरे, निजाम की तरफ से मरने वालो की संख्या 1863 बतायी गयी लेकिन उन हालात में हुई व्यापक हिंसा में मरने वालों की संख्या विभिन्न इतिहासकारों के माध्यम से 50 हजार से दो लाख तक बताई जाती है।
उपरोक्त जानकारियाँ उन लोगों के लिये विशेषकर गौर तलब है जो अकबरुद्दीन के सियासी काफिले को अखिल भारतीय स्वरुप देने की हसरतें पाले बैठे हैं। उन्हें इतिहास के इस पाठ से यह सबक लेना होगा की तत्कालीन निज़ाम और उसकी फ़ौज, उसके संसाधन एक बालक राज्य भारत की फ़ौजी कार्यवाही पांच दिन न झेल सका, अब न निजाम है न उसकी फौज़ बस अकबरुद्दीन के लम्पटई तक़रीरें है और उधर भारत एक विशाल सैन्य शक्ति है अब मुकाबला कैसे होगा ? जंग तकरीरों से नहीं हथियारों से लड़ी जाती है लेकिन अकबरुद्दीन जैसे नेता अनपढ़ और मासूम आवाम को गुमराह करते रहे है। अकबरुद्दीन औवेसी की शक्ल में कासिम रिज़वी की विरासत हैदराबाद में अभी ज़िंदा है। शुक्र है कि आंध्र से बाहर अभी मजलिस को कोई मुसलमान घास नहीं डालता।
अकबरुद्दीन अपने भाषण में अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते नहीं थकते। कोई भी पहली दफा सुनने वाला यह अनुमान लगाएगा कि उन्हें गोली मारने वाला शायद कोई हुकूमत का आदमी होगा। गोली शरीर में होने के किस्से इतने भावनात्मक तरीके से बुने गए जैसे सुनने वालों को लगे कि कौम की किसी जंग में अकबरुद्दीन को 3 गोली लगी, अभी एक गोली बाहर आना बाकी है। मंच से बार-बार कुरआन शरीफ,मौहम्मद का वास्ता देने , नमाज पढ़ने की ताकीद देने वाले इस शख्स की दुश्मनी किसी सरकार से नहीं न किसी गैर मुस्लिम से। मौहम्मद पहलवान नाम के एक शख्स से इनकी जमीन जायदाद को लेकर रंजिश है, उसी सिलसिले में मई 2011 में हुए एक कातिलाना हमले में अकबरुद्दीन ने कौम की खातिर गोलियाँ खाई थी। तब बच्चा-बच्चा इनके लिये रोया, नमाजे पढी काबे में, करबला में दुआएं हुई और तब जाकर हबीबे मिल्लत अकबरुद्दीन की जान बची। न सुनने वाले को शर्म है न कहने वाले को हया है। सच किसी तलवार की तरह सामने है बस थोड़ा तथ्यों पर गौर करना होगा और खुद बा खुद झूठ काफूर हो जायेगा।
अकबरुद्दीन अपने वाहियात तेवरों से पहले भी चर्चा में आ चुके है। तसलीमा नसरीन की हैदराबाद में मुखालफत करने,रुश्दी पर लगे फतवे को लागू करने के मजलिसी फरमान को वह पहले सार्वजनिक कर चुके हैं। जाहिर हैं ऐसे जज्बाती मुद्दों पर आम मुसलमान बहुत खुश होता है, उसकी खुशियों में चार चाँद लगाने के लिए उर्दू प्रैस ऐसे सवालों को हमेशा ज़िंदा रखती है और इन अखबारों को अकबरुद्दीन जैसा आदमी बिकवाने में मदद करता है। जो मुद्दा मुद्दा नहीं होता वह मुसलमानों के जहन में एक बड़ा सवाल बना दिया जाता है। इन बनावटी मुद्दों पर मजलिस जैसी जमाते चुनाव जीत जाती है। इक्कीसवीं सदी में इस्लाम के नाम पर सियासत करने वाले का मकान हैदराबाद के सबसे महंगे इलाके बंजारा हिल में है। जब ये श्रीमान तक़रीर दे रहे हैं तब इस बात पर कोई गौर नहीं करता कि स्टेज पर एक भी महिला नहीं है। इनके पिता का इन्तेकाल हुआ संसदीय सीट खाली हुई तब इन्हें पार्टी में कोई दूसरा काबिल इंसान नहीं दिखा। इनके बड़े भाई असदुद्दीन औवेसी आज अपने पिता की जगह संसद में बैठे हैं और खुद अकबरुद्दीन नेता मजलिस आंध्र प्रदेश विधान सभा सदस्य हैं।
मजलिस की चुनावी सफलता के सफ़र का अध्ययन करने पर कोई भी इस नतीजे पर पहुँच सकता है कि इसमें कांग्रेस का कितना बढ़ा हाथ है? कांग्रेस के समर्थन और गठबंधन के बिना मजलिस का विधान सभा में पहुँचना संभव न था। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता ने देश को एक से बढ़कर एक कद्दावर लम्पट नेता दिए हैं।बाला साहब ठाकरे को मुम्बई में उसके आरंभिक दिनों में यदि कांग्रेस का समर्थन न मिला होता तब क्या शिवसेना जैसी ताकत देश के राजनैतिक नक़्शे पर नज़र आती ? आज अकबरुद्दीन आदिलाबाद में जिस बेअदबी के साथ भारतीय इतिहास के छक्के छुडा चुका है क्या वह संभव होता यदि उसके वालिद सलाहुद्दीन को सांसद बनवाने में कांग्रेस ने अतीत में मदद न की होती ?
कांग्रेस के दिशाहीन और मूल्यरहित राजनीतिक व्यवहार ने देश की राजनीति को बहुत नुक्सान पहुँचाया है। केरल में कम्युनिस्टों के खिलाफ मुस्लिम लीग से समझौता करना उसके वैचारिक दिवालियेपन और राजनीतिक अवसरवाद का परिणाम है जिससे देश की दक्षिण पंथी ताकतों को उसपर हमला करने का अवसर मिला बल्कि मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को पैर जमाने का मौक़ा मिला। अकबरुद्दीन की मौजूदा उवाच को मजलिस की राजनीतिक मोलभाव करने की बढी ताकत के रूप में देखा जाना चाहिए। तेलांगना आन्दोलन अपनी परिणिती पर पहुंचने वाला ही है। यह अच्छा समय है जब राज्य में राजनीतिक स्थितियाँ पूरी तरह से तरल है इसी मौके का फ़ायदा उठा कर मजलिस अपने मुस्लिम वोटों का चेहरा दिखाकर मोल भाव का प्रस्ताव रख रही है। जो सबक उसने पिछले दो दशकों में कांग्रेस से सीखा है वह आज उसी पर पलटवार कर रही है।
उपरोक्त राजनीतिक परिदृश्य के अतिरिक्त मुसलमानों से जुडी,मूलभूत समस्याओं को भी नज़ारा अंदाज़ नहीं किया जा सकता। जो प्रश्न अकबरुद्दीन ने उठाये हैं चाहे वह भूमि वितरण का प्रश्न हो या सरकारी आवासों के आबंटन में मुसलमानों के हिस्से का नदारद होना, गंभीर आरोप तो है ही साथ ही राज्य का मुसलमानों के प्रति रवैय्ये को भी स्पष्ट करता है। ये आरोप सरासर झूठे नहीं। भारत की 10 लाख की फ़ौज में मात्र 29 हजार मुसलमानों की सख्यां होना एक इत्तेफाक नहीं बल्कि किसी योजना का हिस्सा ही है। ठीक इसी तरह दूसरे इदारों में उनकी नौकरियाँ का प्रतिशत असामान्य रूप से कम होना। बैंक के कर्जो में, उसके मौहल्लो के विकास, शिक्षण संस्थाओं का आभाव आदि ऐसी समस्याएँ है जिन्हें न तो राज्य पिछले 65 वर्ष में पूरा कर सका बल्कि इन क्षेत्रों में उसे पीछे धकेलने का प्रयास सजग रूप से हुआ है। साम्प्रदायिक दंगों का अर्थशास्त्र भी मुस्लिम समुदाय के वर्ग हितों पर दक्षिण पंथी हमले के रूप में चिन्हित किया जा सकता है। समस्याएं है, बहुत विकट प्रश्नों से जूझ रहे इस समुदाय को अकबरुद्दीन जैसे जहरीले भेडिये के सामने धकेलने में किन परिस्थितियों, दलों, सरकारों और राज्य शक्तियों का हाथ है इसकी पड़ताल की जानी चाहिए। यह वही हैदराबाद है जिसने वामपंथी उम्मीदवार आर एन रेड्डी को नेहरू से भी अधिक वोटों से जीता कर संसद में भेजा था, यह वही हैदराबाद है जिसकी चारमीनार सिगरेट मज़दूरों के नेता मखदूम मोईनुद्दीन चुने गए थे, मखदूम इसी शहर से चुनाव जीत कर विधान सभा में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हुआ करते थे। क्या यह वही भूमि नहीं जिसने राजेश्वर राव जैसे नेता कई बड़े नेता इस देश को दिए।
भारतीय राज्य अपने बहुजनो, अल्पसंख्यकों आदिवासियों के प्रति अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में असफल हुआ है। क्षेत्रीय संप्रभुता को बनाए रखने क नाम पर कभी कश्मीर तो कभी उत्तर पूर्व में अभूतपूर्व शक्ति का प्रयोग करके विभिन्न सामाजिक समूहों को अपने प्रभामंडल से उसने विरक्त किया है। देश की न्यायप्रणाली और उसके राजनीतिक प्रश्रय ने लोकतंत्र का भद्दा मजाक उड़ाते हुए बाल ठाकरे, मोदी, तोगड़िया, आडवानी, सिंघल, ऋतंभरा जैसे खलनायकों को पैदा किया है। अदालतें दोषियों को सजा न दे सकी, अपराधी संसद में राजसत्ता की मलाई चाटते दिखे तब ऐसी निराशा में छत्तीसगढ में आदिवासी अगर हथियार बंद आन्दोलन चला सकते है तब अकबरुद्दीन जैसे अनासिर को नारा इ तकबीर-अल्लाहु अकबर के नारे के साथ राजनीति करने से कौन रोक सकता है?
पूरा देश आज इन तमाम हरकतों को देख रहा है। धर्म का धूर्ततापूर्ण राजनीतिक इस्तेमाल और उसके फायदे -नुकसान आज सभी के सामने है। भगुवा राष्ट्रवाद नरेन्द्र मोदी के विकास की आड़ में दिल्ली कब्जाने की फिराक में लगा है। जो सत्ता में है वह मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को उकसा कर अपनी रोटियाँ सेकने में व्यस्त है। बहुजन स्वामी ताकतें अपनी स्वार्थ सिद्धी में व्यस्त है, जनवादी ताकतें अपनी लगातार हुई हारों के कारण पस्त है, यही सही वक्त है अकबरुद्दीन के लिए जिसने कहा 'जिसकी लाठी उसकी भैंस'. दक्षिण पंथी हिंदुत्व ताकतों ने ठाकरे को चालीस साल जिन्दा रखा, मोदी पिछले 15 साल से ज़िंदा है। अब मुसलमान दक्षिणपंथी ताकतों की बारी है, पहले उनका ईमान दाऊद पर आया, मज़हबी ऐतबार से ज़ाकिर नायक उनका महानायक बनता जा रहा है (सैंकड़ो हिन्दू बाबा बाबी के महा प्रचार तले यह मुस्लिम आफ शाट है) अब सियासी ठाकरे टाईप नेता की कमी थी इस महाशून्य को अशरफी मुसलमान अकबरुदीन औवेसी ने पूरा करने का ऐलान कर दिया है। फिलहाल वह लंदन से पाकिस्तानी मुहाजिर नेता अलताफ हुसैन की भाँती दूर से नज़ारा कर रहा है।
फोटो सौजन्य : गूगल

Monday, December 24, 2012

ज़िंदा इंसान को जला कर नज़ारा देखते धर्मांध लोग


विश्व शांति सैनिको ने विश्व शांति की पवित्र पुस्तक की अवमानना के जुर्म में पहले कथित अपराधी को पीटा फिर व्यापक शांति की स्थापित करने हेतु उसे जिंदा जला कर मार डाला। दादू सिंध (पाकिस्तान) के सीता गांव में कोई राहगीर गरुवार की रात को रुका था, अगले दिन मस्जिद में पवित्र कुरआन के पन्ने जले हुए पाए गए। इमाम मेमन के संदेह पर पहले इस मुसाफिर को गांव वालों ने पीटा फिर पुलिस को सौंप दिया। 21 दिसंबर के दिन हुई इस घटना में फिर कोई 200 शांति सैनिकों का हुजूम थाने पर जा पहुँचा, मुसाफिर को फिर पीटा और इस बार उसे ज़िंदा जला कर ही दम लिया। 1990 से ईश निंदा के नाम पर अब तक 53 लोगों को पाकिस्तान में सरे आम मारा जा चुका है। शांति के नाम पर जाने कितने बेगुनाह अभी तक इन तथाकथित शांति सैनिकों द्वारा जीवन मुक्त कर दिए गए हैं यह शोध का विषय है।
धर्म के नाम पर इस क्रूक हिंसा की मैं मुखालफत भी करता हूँ और मज़म्मत भी। कामना करता हूँ कि भौंडी शांति के इस खून खराबे वाले रास्ते का अंत अति शीघ्र हो।
फोटो : पैन अर्मेनियन डाट नेट

Sunday, December 2, 2012

कथावाचक जाकिर नायक के अतार्किक प्रवचन

कथावाचक जाकिर नायक की सुनो इस वीडियो में फरमा रहे हैं, अपने धर्म ग्रन्थ का हवाला देकर कि अल्लाह दुआ माँगने वाले को बी एम डब्लू मोटर साईकिल इसलिए नहीं दे रहा कि वह जानता है कि वो एक अच्छा शख्स है और दुर्घटना में मर सकता है, वो उसे बचाना चाहता है इसलिए उसके मरने का साधन नहीं दे रहा। लिहाजा उसकी दुआ अनसुना करके भी वह उसकी दुआ सुन रहा है , वाह ... दुआ माँगना उसका असर होना न होना ये अलग मसला रहा उस पर फिर कभी ..फिलहाल इस लफ्फाजी को कुछ आंकड़ों के आईने में अकल लगा कर देखते हैं .
प्रतिदिन दुनिया में 3500 लोग सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवाते हैं, भारत में अल्लाह की कृपा सबसे अधिक है कि सड़क दुर्घटना में मरने वालों का सबसे बड़ा रिकार्ड इसी मुल्क के नाम है, मानो अल्लाह को जिसे निपटाना हो उसे एक गाडी दिलवा देता हो, कच्चे पक्के मिलाकर हर साल कोई 2 लाख मौतें भारत में हो रही है। मरने वाला अपनी जान से गया लेकिन अल्लाह उद्योगपतियों की तिजोरियाँ भरने में लगा है। कथावाचक जाकिर नायक और उसकी किताब की माने तो जो कुछ भगवान करता है वह या तो बन्दे परीक्षा हो रही है या उसे इनाम दिया गया है, अब इन सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले परीक्षा में फेल हुए या अपने इनाम को झेल नहीं पाये? इस जगह इनके तर्क पहुँच ही नहीं पाते। ऐसी वाहियात बातों और अतार्किक प्रवचनों को कितनी गौर से लोग बिना अपनी अकल लगाए गाय भैसों की तरह कैसे सुन लेते हैं? यह बड़े ताज्जुब की बात है। सूट बूट पहने, बकरेनुमा दाढी,मध्यकालीन विचारधारा का प्रचार करना , वह भी सभी वैज्ञानिक तकनीको का प्रयोग करके- कोई इन अंतर्विरोधों पर इस सर्वश्रेष्ठवादी ढकोंसले बाज़ से प्रश्न क्यों नहीं करता ? धर्म विवेक और तर्कशीलता का ह्रास किस कदर करा देता है और ऐसी फितरत का इंसान समाज में चेतना के स्तर को कितने रसातल में पहुंचा सकता है ? वह इस महाशय और उसके चाहने वालों को देख कर पता चल जाता है। 
  
http://www.youtube.com/watch?v=8a0V1DXAT-E&feature=g-wl&list=WLOY2z2wTrYxGCujEorGxo8j3xi8yNB_3C

Tuesday, November 20, 2012

राजनीतिक इस्लाम फासीवाद से भी अधिक क्रूर है, उसने जहां जहां अपना सर उठाया मानवता को लज्जित किया और आधुनिक सभ्यता को शर्मसार भी किया। हमास ने गाज़ा पट्टी पर जब से हकुमत संभाली है सबसे पहले उसने फताह जैसे प्रगतिशील ग्रुप के सदस्यों को भेड़ बकरियों की तरह मारा। इस्लामी शिक्षा के आधार पर इजराइल के खिलाफ नफ़रत का कारोबार उसे युद्ध के मुहाने पर हर दम रखता ही है। युद्दोंमाद कि आड़ में राजनीतिक रोटियाँ सेके बिना इनकी कोई नमाज़ भी पूरी नहीं होती। पडौसी मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड की हकुमत बनने के बाद से ही दीवारों पर वह इबारत साफ़ दिखने लगी थे जिसका आज सातवा दिन है। युद्ध में 125 फलस्तीनी और 3 इज्राईली अपनी जानें गवां चुके हैं। हमास की खून की प्यास अभी पूरी नहीं हुई, खबर है कि 6 फलस्तीनियों को इस्राईल का मुखबिर बता कर हमास के फासीवादी जिहादियों ने सड़क पर सरेआम लिटा कर उनकी ह्त्या कर दी उनमे से एक लाश को मोटरसाईकिल के पीछे बाँध कर शहर में घुमाया गया, इसी बर्बर संस्कृति का नाम राजनीतिक इस्लाम है, यही धार्मिक फासीवाद है, हमास की गाजा सरकार के पक्ष में मुट्ठी भींचने से पहले ज़रा फतह के हज़ारो साथियों की बलि के बारे में जरुर सोचना।हमास/हिजबुल्लाह /ब्रदरहुड/जमात जैसे नाम का कैंसर आपके मौहल्ले, गाँव, कस्बे, शहर और देश में भी फ़ैल जाएगा और एक दिन ये नज़ारा आपके शहर का भी होगा। युद्ध का विरोध हो लेकिन युद्दोंमादों का भी नाश हो, धर्म को राजनीति में विलय करने वालों का भी नाश हो। धर्म आधारित राजनीति मौजूदा विश्व में कहीं शांति स्थापित नहीं कर सकती, ऐसी ताकतों का बहिष्कार करना हर शांतिवादी कर्मी का पहला कर्तव्य है ।

राजनीतिक इस्लाम फासीवाद से भी अधिक क्रूर है, उसने जहां जहां अपना सर उठाया मानवता को लज्जित किया और आधुनिक सभ्यता को शर्मसार भी किया। हमास ने गाज़ा पट्टी पर जब से हकुमत संभाली है सबसे पहले उसने फताह जैसे प्रगतिशील ग्रुप के सदस्यों को भेड़ बकरियों की तरह मारा। इस्लामी शिक्षा के आधार पर इजराइल के खिलाफ नफ़रत का कारोबार उसे युद्ध के मुहाने पर हर दम रखता ही है। युद्दोंमाद कि आड़ में राजनीतिक रोटियाँ सेके बिना इनकी कोई नमाज़ भी पूरी नहीं होती। पडौसी मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड की हकुमत बनने के बाद से ही दीवारों पर वह इबारत साफ़ दिखने लगी थे जिसका आज सातवा दिन है। युद्ध में 125 फलस्तीनी और 3 इज्राईली अपनी जानें गवां चुके हैं। हमास की खून की प्यास अभी पूरी नहीं हुई, खबर है कि 6 फलस्तीनियों को इस्राईल का मुखबिर बता कर हमास के फासीवादी जिहादियों ने सड़क पर सरेआम लिटा कर उनकी ह्त्या कर दी उनमे से एक लाश को मोटरसाईकिल के पीछे बाँध कर शहर में घुमाया गया, इसी बर्बर संस्कृति का नाम राजनीतिक इस्लाम है, यही धार्मिक फासीवाद है, हमास की गाजा सरकार के पक्ष में मुट्ठी भींचने से पहले ज़रा फतह के हज़ारो साथियों की बलि के बारे में जरुर सोचना।हमास/हिजबुल्लाह /ब्रदरहुड/जमात जैसे नाम का कैंसर आपके मौहल्ले, गाँव, कस्बे, शहर और देश में भी फ़ैल जाएगा और एक दिन ये नज़ारा आपके शहर का भी होगा। युद्ध का विरोध हो लेकिन युद्दोंमादों का भी नाश हो, धर्म को राजनीति में विलय करने वालों का भी नाश हो। धर्म आधारित राजनीति मौजूदा विश्व में कहीं शांति स्थापित नहीं कर सकती, ऐसी ताकतों का बहिष्कार करना हर शांतिवादी कर्मी का पहला कर्तव्य है ।
http://www.dailymail.co.uk/news/article-2235635/Gaza-conflict-Egyptian-president-says-peace-Gaza-imminent-predicts-lasting-ceasefire-begin-tomorrow.html?ICO=most_read_module
दूसरा लिंक भी देखें
http://www.youtube.com/watch?v=tm-Gh7Oxy0Y

Friday, October 19, 2012

हज २०१२: क्या यह सिर्फ़ धार्मिक कर्मकाण्ड है या शुद्ध अर्थशास्त्र?



हज दुनिया का सबसे बडा सालाना धार्मिक समारोह है जिसमें भाग लेने वालों की संख्या में हर वर्ष वृद्धि दर्ज की जा रही है. सबसे बडा समारोह होने के साथ-साथ यह दुनिया के सबसे पुराने धार्मिक उत्सवों में भी एक है. पिछले १४०० सालों (कुछ एक सालों को छोड़ कर जब सुरक्षा कारणों से हज स्थगित रहा) से यह अपने इस्लामी स्वरुप के साथ नियमित रुप से जारी है. मक्का पर मुसलमानों के अधिपत्य से पूर्व मक्का में यह सालाना वर्जिश सदियों पुरानी थी जिसमें तत्कालीन समाज के कबीले अपने-अपने देवी देवताओं के बुतों के साथ मक्का आते और अपना वार्षिक धार्मिक उत्सव मनाते. ऐतिहासिक रुप से यह सालाना मेला स्थानीय कारोबार-रोज़गार-आर्थिक गतिविधियों को एक फ़ैसलाकुन ताकत देने की कुव्वत उस वक्त से लेकर १९७२ तक कायदे से रखता रहा है. इस्लामी हकुमतों के दौरान मक्का-मदीने पर नियंत्रण तत्कालीन राजनीति का एक महत्वपूर्ण सवाल रहा है, जाहिर है यह वह एक आर्थिक प्रश्न है जिसके इर्द-गिर्द धर्म और धार्मिक नीतिशास्त्र की रचना हुई. इस लेख का उद्देश्य हज से संबंधित धार्मिक किस्से कहानियों से इतर हज की एक बौद्धिक-आर्थिक व्याख्या करना है.



लगभग पौने तीन करोड़ की आबादी वाले सऊदी अरब में स्थित मक्का-मदीना पूरी दुनिया के कोई डेढ अरब मुसलमानों का एकमात्र धार्मिक पर्यटक स्थल है जहां हर एक धनपति मुसलमान मरने से पहले जाना चाहता है. अधिक से अधिक की कोई सीमा नहीं, कुछ नियमों,मंत्रों के अनुसार आप अपने पिता, मां, दादा, दादी, नाना, नानी के लिये उनकी अनुपस्थिती में हज कर धर्म लाभ उठा सकते है, उनके गुनाह माफ़ करा सकते हैं और उनके लिये जन्नत में जगह पाने की प्रार्थना कर सकते हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस जगह की गई दुआ असफ़ल नहीं होती. यह धार्मिक मान्यता है लेकिन जरा सी बुद्धि लगाते ही इन मान्यताओं के आर्थिक मन्तव्य स्पष्ट हो जाते हैं. जाहिर है पिछले १४०० वर्षों का धुआंधार प्रचार और इस्लाम के मूल पांच अरकानों में से आखिरी और एक होने के कारण हज, एक आम मुसलमान के लिये ऐसा स्वप्न है जिसे पूरा किये बिना वह मरना भी नहीं चाहता. हज एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसकी मार्केटिंग धर्म के जरिये आपको पैदा होते ही अपने पूर्वजों और मुल्लाह के द्वारा विरसे में मिल जाती है. आप जीवन भर मेहनत करते हैं पैसा कमाते हैं और कुछ बचा कर रखते है कि मरने से पहले हज हो जाये. इसे आप अमूर्त रुप में नहीं कर सकते जबकि सारा धर्म अमूर्त है. हज आपको मूर्त रुप में ही करना होगा, पैक्टिकली जाना होगा, वीसा लेना, हवाई जहाज, होटल, कपडे, तोहफ़ों की खरीदारी आदि ये सब हज के दौरान होने वाले वह खर्च हैं जिनसे आपको दो चार होना ही है. यात्री सिर्फ़ अपने धार्मिक लाभ के लिये हज कर रहा है ऐसा देखना, दिखाना, बताना और सुनाना एक धार्मिक सच जरुर हो सकता है लेकिन वास्तविकता में, इसे लौकिक धरातल पर देखा जाये तब तस्वीर दूसरी ही नज़र आती है. यह भी सच है कि लौकिक अर्थों को धर्म क्यों परिभाषित करेगा? हज के अर्थशास्त्र पर इस लिहाज से एक नज़र डालना प्रासंगिक होगा. यह मसला है तो टेहडा क्योंकि राजा की हकुमत है और वह अगर सही आंकडे रखती भी हो तो किसी को उपलब्ध नहीं कराती, गाहे बगाहे खलीज के अखबारों में जो सूचनायें सरकारी हवालों से प्रसारित होती हैं उन्ही का लेखा जोखा यहां दिया जा रहा है.



१९२५ में मौजूदा सऊदी के शासकों के पास मक्का-मदीने पर कब्जे के बाद (उससे पहले ओटोमन तुर्की साम्राज्य के पास यह अधिकार था) १९२७ में तकरीबर ३ से साढे तीन लाख लोगों ने हज में शिरकत की जिनमें करीब डेढ लाख हाजी विदेशी थे. यह संख्या १९७२ में दस लाख हुई जिनमें ४.७९ लाख हाजी विदेशी थे. २००९ में तकरीबन ३० लाख लोगों ने हज किया जिनसे एक अनुमान के मुताबिक ३० अरब डालर का धंधा सऊदी सरकार को प्राप्त हुआ. २०११ में सऊदी का कुल घरेलू उत्पाद ६९१.५ अरब डालर का था, हज से प्राप्त होने वाला रेवेन्यु उसकी जी.डी.पी. का कोई ७% था जो बिना तेल की आय की मदों में देखा जाये तब यह उस आय का २२% है. इन दिनों हज हर साल सऊदी में करीब १६०,००० नौकरियां उपलब्ध कराता है. हज के दौरान खुदरा व्यापार, होटल, विमानन, ट्रांस्पोर्ट, एयरपोर्ट, पर्यटन, टेलीकाम, डाटा, खाद्य उद्योग ऐसे धन्धे हैं जिनका विकास और विस्तार इस आयोजन से सीधा जुडा है.



पाकिस्तान की एक सरकारी वेब साईट के मुताबिक प्रत्येक हाजी से वसूल की जाने वाली धनराशी का विवरण देना यहां जरुरी है. तीन प्रकार के वीसा हाजियों के लिये हैं जिनकी कीमतें अलग अलग है:

नीला वीसा: कीमत लगभग ३५०० डालर मक्का और मदीना में मस्जिदे हरम से आवेदक के आवास की दूरी ९०० मीटर

हरा वीसा: कीमत लगभग २९०० डालर मक्का और मदीना में मस्जिदे हरम से आवेदक के आवास की दूरी ९०० से २००० मीटर

सफ़ेद वीसा: कीमत लगभग २४०० डालर मक्का और मदीना में मस्जिदे हरम से आवेदक के आवास की दूरी २००० मीटर से अधिक.

पाकिस्तान से २०१२ में हज यात्रा पर जाने वालों की संख्या १७९,२१० तय की गयी है. उपरोक्त कीमतों में हवाई यात्रा का किराया शामिल नहीं, हज के दौरान अधिकतर हाजियों को सऊदी अरब एयरलाईन्स का ही टिकट लेना होता है. उत्तरी अमेरिका और यूरोप से जाने वाले हाजियों का खर्चा एशिया से जाने वाले हाजियों से कहीं अधिक होता है. एक हाजी का औसत खर्चा लगभग ३४०० डालर होता है जिसमें उसकी निजी खरीदारियां शामिल नहीं.



हज के अतिरिक्त साल भर उमरा करने वालों का इन दिनों मुस्लिम नव-धनपशुओं में एक नया क्रेज़ देखा जा रहा है. इस वर्ग को आर्कषित करने के लिये मक्का को लास वेगास की तरह पांच सितारा होटलों से घेर दिया गया है, जिनमें आधुनिक होटल उद्योग में पायी जाने वाली सभी सुख-सुविधायें मौजूद हैं. रमजान के दिनों में दुनिया भर के मुस्लिम धनाढ्य वर्ग आजकल उमरा करता है. खासकर लैलत अल कबीर की रात को पिछले साल हुई तराबी की नमाज में ३० लाख लोगों ने हिस्सा लिया. इस रात को कुरान शरीफ़ की पहली आयत अवतरित हुई थी लिहाजा इसकी बरसी मनायी जाती है. इस आबादी में सऊदी की मुकामी आवाम, जो छुट्टियों में सैर सपाटे के साथ सभी धार्मिक स्थलों का भ्रमण, जियारत और इबादत भी करने की शौकीन हो रही है भी शामिल है. यह संख्या हर साल होने वाले हाजियों की संख्या के बराबर ही है.



उपरोक्त अध्य्यन के आलोक में यह कहा जा सकता है कि इस्लाम के पांच आवश्यक अरकान में अंतिम अरकान हज का आर्थिक महत्व कितना बडा है. क्या यही वह आर्थिक अस्त्र नहीं है जिसके रहते मक्का-मदीना के इर्द गिर्द मानव समाज-सभ्यता हज और उससे जुडे कारोबार के जरिये अपना भरण पोषण करती रही? १९६० के दशक में सऊदी में तेल की आमदनी आने के बाद निश्च्य ही इस उद्योग पर निर्भता घटी, लेकिन आज भी सऊदी अरब की सरकार जितना हज और उससे जुडे संसाधनों पर खर्च करती है, उससे कहीं अधिक आय राजा के खजाने में हर साल जमा हो जाती है. हाजियों को अपने इस धार्मिक कर्मकाण्ड का अर्थशास्त्र समझ में आना चाहिये और अपने आस पडौस, मौहल्ला, कस्बा, शहर और देश के विकास में पहले योगदान करना प्रथम लक्ष्य होना चाहिये बजाये इसके कि अपनी गाढी कमायी को किसी दूसरे मुल्क के अय्याश शासकों के खजाने भरने में लगायी जाये. बंगलादेश, पाकिस्तान, सूडान, इथोपिया, सोमालिया और भारत जैसे गरीब देशों से हज यात्रा पर जाते देख किसी को अगर प्रसन्नता होती है तो यह उसकी मूढ़ता का सबसे बडा उदाहरण ही है जिसे धर्म के कर्मकाण्ड ने मुंह छिपाने की आसान जगह दे दी है. पारलौकिक सुख की भूख ने उसे इतना खुदगर्ज भी बना दिया कि वह मरने के बाद अपनी खुशहाली के लिये उर्जा भी खर्च कर रहा है और धन भी, लेकिन जीते जी इंसान और समाज की वह मदद नहीं करेगा जिससे मानवजाति के गरीबी जैसे कोढ़ को काटा जा सकता है. तीस अरब डालर कोई छोटी रकम नहीं, बहुत से ऐसे देश है जिनकी गरीबी एक झटके में एक ही साल में दूर की जा सकती है.

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रचनाकाल: अक्टूबर २०,२०१२

फ़ोटो: गूगल

Tuesday, October 9, 2012

कौन है मलाला यूसुफ़ज़ई का दुश्मन??


हराम-टुकडखोर पाकिस्तानी तालेबान ने १४ साला मलाला यूसुफ़ज़ई पर कातिलाना हमला करने की ज़िम्मेदारी लेकर दुनिया भर के मुस्लिमों को अपना बदसूरत चेहरा दिखाया है, यह कोई पहला और आखिरी हमला नहीं. यह कोई नई वजह भी नहीं, बस उन्हें औरतों के बीच तालीम का कोई नया उभरता हुआ सितारा गवारा नहीं. हाल में इरान की मुल्लाह हकूमत ने भी विज्ञान, साहित्य, इंजीनियरिंग विषयों के अध्ययन पर महिलाओं के खिलाफ़ पाबंदी लगा दी थी. यह भी कोई न पहला मसला है न आखिरी.

दुनिया भर में इस्लाम के नाम पर मुल्लाहों की इस गुण्डागर्दी का विरोध कब होगा? १४०० साल से औरत पर हो रहे इस एक तरफ़ा हमले का अंत कब होगा? आखिर कब तक जदीद सोच रखने वालों के खिलाफ़ गज़-गज़ भर दाढी रखने वाले मज़हबी डकैत अपना कब्ज़ा जमाये रखेंगे? आखिर कब तक मुसलमानों में दूसरी ख़तीजा को पैदा होने से रोका जाता रहेगा? आखिर पृथ्वी का यह खित्ता जिस पर कथित इस्लाम का प्रभाव अभी है अथवा रहा है उस पर इल्म की रोशनी का सूरज कब तक बस दूर ही दूर से मुँह चिढाता रहेगा?

पाकिस्तान के जनक जिन्नाह ने इस मुल्लाह नस्ल का मुकाबला बहुत कडे अंदाज़ में किया था, अपनी बहन फ़ातिमा का दाखिला जब उन्होंने बंबई के प्रतिष्ठित स्कूल में कराया था तब बडी दाढि़यां बिदकी थी खासकर उन्हें अपने फ़ैसले से आगाह कराने के लिये जिन्नाह ने फ़ातिमा को स्कूल जाने-आने के लिये घोडों की एक बग्गी बनवाई थी, मुल्लाह के विरोध को जिन्नाह ने अपने फ़ैसले के घोडों तले रौंदा था. आज उसी पाकिस्तान में दाढ़ियों का आतंक सर्वव्यापी हो गया है और जिन्नाह के चाहने वाले अपनी सोच और कर्म की दुकड़ियों में दुबके बैठे हैं, कभी बेनजीर के मरने का इंतज़ार कर रहें तो कभी सलमान तासीर के तो कभी मलाला..

क्या यह प्रश्न सिर्फ़ पाकिस्तान के मुसलमानों भर का है? अगर कोई ऐसा सोचता है तो गलत है, वह उस कबूतर की मानिंद है जो बिल्ली को देख कर आँख बंद कर लेता है यह सोच कर कि बिल्ली चली गयी, बिल्ली जाती जरुर है, लेकिन कबूतर की गर्दन उसके मुँह में साथ होती है.

इस्लाम के अंदर सफ़ाई की कई मुहीमें बडे बडे दानिश्वरों ने चलायी लेकिन आज जो सामने दिखाई दे रहा है उससे साफ़ जाहिर है कि अब न केवल रणनीति ही बदलनी होगी वरन हथियार भी बदलने होंगे, इस कबायली इस्लाम के कैंसर का इलाज अब एक सफ़ल आप्रेशन ही है, आज नहीं तो कल, हम खुद करें या कोई और, इसको पालने पोसने का वक्त चला गया है अब इससे छुटकारा पाना ही होगा.
 
फ़ोटो: तारिक फ़ातेह की वाल से