Sunday, May 12, 2013
इरान- सऊदी छाप न्याय व्यवस्था में पिसते खुद उनके नागरिक
जब मई २००६ की एक सुबह को इरान के २४ मछुआरे फारस की खाड़ी में मछली पकड़ने निकले थे, तब उन्हें नहीं मालूम था कि उनमे से कई लोगो का यह आख़िरी सफ़र है...समंदर का तूफ़ान उनकी किश्ती को सऊदी जल क्षेत्र में ले गया, नतीजतन उन्हें सऊदी सिपाहियों ने पकड़ लिया...कोई ४० दिन के बाद इनके परिवारों को पता चला कि ये लोग जेल में है और उन पर मादक पदार्थो की तस्करी का आरोप लगा है. इनमे से ८ की गर्दने १५ अप्रेल को सऊदी सरकार ने उड़ा दी १५ अभी जेल में है ..जिनके पास अपने बचाव का न कोई वकील है न दलील..पीछे बिलखते इनके परिवार है.
इरान और सऊदी दोनों इस्लाम के अलग-अलग ब्रांड के प्रायोजक है और दोनों मुल्को पर मानव अधिकार हनन के घृणित आरोप है. एक तीसरा पक्ष है एक देश का कैदी दुसरे देश में जाकर अपने सभी अधिकारों से वंचित हो जाता है. तीसरी दुनिया (भारत सहित) के इन देशो में जब भी ऐसी कोई घटना होती है तब ऐसे कैदी अक्सर सियासत की बिसात पर मासूम प्यादे बन जाते है, क्या ऐसी स्थिती में किसी तीसरे पक्ष 'होना' यहाँ अनिवार्य करना वक्त का तकाजा नहीं ?
इस वृत चित्र में पकडे गए मछुआरो में मुझे कोई भी तो तस्कर नहीं लगा? बिलखती बेटियाँ, रूंधे लडके, सदमे में तड़पते वालदायन और उनकी गरीबी सऊदी अरब के कथित इस्लामी इन्साफ पर सहज ही प्रश्न चिह्न लगा देती है. धर्म के नाम पर दोनों मुल्को की सरकारों ने अपनी जनता के मौलिक अधिकारों का गला घोंट दिया है, इतिहास के इस पीड़ादायक निर्मम जुए को उतार फेंकना हर उस आदमी का फ़र्ज़ है जिसकी आँखे इस वृत चित्र को देख कर भर आये...ऐसी हकूमतो, ऐसी व्यवस्थाओं और ऐसे निजाम पर मैं लानत भेजता हूँ.
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=MQPSTEKe12Y
Sunday, April 21, 2013
अफ़गान तालेबान और मुस्लिम महिला शिक्षा
मानव सभ्यता का
संभवत: सर्वप्रथम विश्वविद्यालय 'तक्षशिला विश्वविद्यालय' की मेजबानी करने वाला देश अफगानिस्तान आज लड़कियों की शिक्षा का सबसे
प्रबल विरोधी क्यों बन गया है ? अफगानिस्तान स्थित इस्लामी ताकते लड़कियों के
स्कूलों में छात्राओं को कभी जहर देकर, कभी खतरनाक गैस फैलाकर, तो कभी डरा धमका कर
ऐसा माहौल पैदा कर रही है कि लड़कियाँ पढ़ न सकें. २००१ के बाद करजई हकूमत के शिक्षा
मंत्रालय ने ५५० छात्राओं के स्कूलों को सुरक्षा कारणों के चलते बंद किया है,
जिससे देश के ११ प्रान्तों में तीन लाख से अधिक छात्राएं प्रभावित हुई है.
गत गुरूवार को ताखर
सूबे की राजधानी तालूकान के बीबी हव्वा गर्ल्स हाई स्कूल की ७४ छात्राओं को एक
अन्जानी गैस के रिसाव के चलते अस्पताल में दाखिल कराया गया है, पिछले साल से अब तक
ऐसी चार घटनाएँ हो चुकी है. यह इलाका मुल्सिम कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव क्षेत्र
माना जाता है. ये काली ताकते अफगान समाज की लड़कियों में शिक्षा के प्रचार प्रसार को लेकर सर्वाधिक चिंतित
है..इत्तेफाक से इस्लाम का अफ़ग़ान छाप ब्राण्ड इन दिनों भारत-पाकिस्तान सहित अन्य कई मुल्को में प्रचलित है..दुनिया को
फिर अँधेरे की तरफ ले जाने वाली ताकतों के विरूद्ध जनता का जन युद्ध ही इसे परास्त
कर सकता है. अमेरिका का पैदा किया हुआ यह जिन्न अब उसके काबू से बाहर हो चुका है. इस काले सांप
का फन सिर्फ और सिर्फ जनता के पैर ही कुचल
सकते है ...आपकी गली मुहल्ले में इनसे
मिलाता जुलता कोई भी मिले उसका प्रतिकार करना मानव जाति के प्रति सबसे बड़ा उपकार
होगा.
http://www.policymic.com/articles/36945/afghan-girls-school-poisoning-74-girls-poisoned-in-suspected-taliban-gas-attack
फोटो सौजन्य : गूगल
Saturday, April 13, 2013
तारेक फतह और जामिया प्रकरण : जनवाद पर इस्लामी ताकतों का हमला
बंगलादेश और भारत की आजादी से जुड़े प्रश्नों पर एक किताब लिखने के सन्दर्भ में
तारेक फतह इन दिनों कनैडा से भारत यात्रा
पर है. दो दिन पहले दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया विश्व विद्यालय में उनका एक
प्रश्नौत्तर कार्यक्रम होना तय था जिसे कथित इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव के चलते
रद्द कर दिया गया. भारत और उसके जनतंत्र को लेकर तारेक फतह जैसे बहुत से
बुद्धीजीवी अक्सर भ्रम में रहते है लेकिन जैसे ही कडुवे यथार्थ से दो चार होते है
तब उन्हें जमीनी हकीकत का पता चलता है.
मेरा स्पष्ट मत है कि तारेक फतह भारत में किसी भी जगह मुसमानो के बीच स्वतन्त्र रूप से अपने विचार
सार्वजनिक रूप से नहीं रख सकते. भारत के मुसलमानों में आलोचना सुनने की क्षमता न
तो पहले थी न अब है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय हो या जामिया ...दोनों परिसरों
में इस्लाम के प्रति किसी आलोचनात्मक आवाज को सुनना संभव ही नहीं है.
दो वर्ष पूर्व मेरठ विश्वविद्यालय परिसर में न्यू ऐज इस्लाम डाट काम के संस्थापक और सूफी इस्लाम के प्रवक्ता सुल्तान
शाहीन को जमाती मुसलमान छात्रों ने ३ मिनट भी नहीं बोलने दिया था, इसी परिसर में
इस्लाम के विश्व विख्यात विद्वान मौलाना
वहीदुद्दीन खान साहब के हाथ से माइक छीन लिया गया था और उन्हें बेइज्जत करके परिसर
छोड़ने को मजबूर किया गया. अब हालत यहाँ तक पंहुच चुके है कि इस्लाम की धर्म
निरपेक्ष व्याख्या करने वाले बुद्धीजीवियों तक के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा जा रहा
है, तब भारत में तारेक फतह जैसे बेबाक
राजनीतिक इस्लाम के कटु आलोचक को भला कैसे सुना जा सकता है? मजे कि बात यह है कि
ये तीनो लोग मुसलमान है. इस्लाम पर कोई भौतिकवादी, संदेहवादी, यथार्थवादी,
नास्तिक, बुद्धीवादी या मार्क्सवादी बोले
इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती. जब मुसलमानों के कथित शिक्षण संस्थानों का बौद्धिक स्तर इस
हद तक गिर चुका हो, तब आप मुस्लिम समाज के
चिंतन के स्तर का अंदाजा खुद ही लगा सकते है. यह भी सच नहीं की सौ प्रतिशत मुस्लिम
आबादी की सोच इन फासीवादियो से मिलती हो? लेकिन ऐतिहासिक रूप से बुनियाद परस्त
मुस्लिम ताकतों ने लिबरल सोच के मुलसमानो पर अपने भय की गिरफ्त बनाए रखने में
कामयाबी पायी है जिसके चलते यह बड़ा वर्ग अपनी चुप्प आपराधिक चुप्पी के जरिये अपना
समर्पण कर चुका है. जामिया जैसे प्रसंगों
के माध्यम से इस्लाम के राजनितिक फासीवाद
का भारत सहित विश्वव्यापी चरित्र आसानी से समझा जा सकता है जिसके खिलाफ तारेक फतह
की आवाज को दुनिया में हमेशा याद किया जाएगा.
भारत के मुसलमानों द्वारा कट्टरपंथी इस्लाम की सलफी अवधारणा के पीछे छिपे
कारणों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समीक्षा भी करनी होगी और उसकी सरकारी पपड़ताल
भी करना उतना ही जरूरी है. बोलने के मौलिक
अधिकार और धार्मिक भावनाओ को भड़काने जैसे लच्छेदार मुहावरों को गौर से अगर देखे तो
पायेंगे कि एक तरफ इस विषय पर जनवादी शक्तियो द्वारा इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों के
सामने आपराधिक समर्पण दिखेगा दूसरी तरफ मुसलमानों के भीतर फासीवादी शक्तियों
द्वारा जनतान्त्रिक अधिकारों के आवरण तले पूरे मुस्लिम समाज में अपनी पकड़ बनाने की
एक सतत प्रक्रिया दिखाई पड़ेगी जिसके तार सऊदी अरब और इरान तक से जुड़े नज़र आयेगे.
तारेक फतह के प्रकरण पर वामपंथी ताकते ठीक उसी तरह चुप्पी साधे है जैसे
उन्होंने अतीत में सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन के मुद्दे पर अख्तियार की थी.
बोलने की आज़ादी के लिए संघर्ष करने से बड़ा
कार्यभार शायद अब उनका चुप रह कर इन मुस्लिम साम्प्रदायिक ताकतों का अघोषित समर्थन
करना भर रह गया है. लगता है इतिहास से कोई सबक सीखने की आदत अब उनमे नहीं रही न ही
समझ. इरान में तुदेह पार्टी ने खुमैनी के शाने बशाने संघर्ष किया और इरान की हकूमत
मुल्लाहो के हाथ में आते ही सबसे पहले तुदेह पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का
कत्लेआम इस्लाम के नाम पर किया गया जिसमे लगभग २० हजार कम्यूनिस्टो ने शहादते दी.
आज भी यह प्रक्रिया रुकी नहीं है. इसी तरह दूसरे इस्लामी मुल्को में कम्यूनिस्टो
को गाज़ा में, ट्युनिसिया और मिस्र में बली का बकरा बनाया गया है और आज भी बनाया जा
रहा है. क्या राजनीतिक इस्लाम के इस फासीवादी चरित्र का भंडाफोड़ समाजवादी या
बहुजनस्वामी ताकते करेगी ? क्या इस प्रश्न पर काग्रेस जैसी मौकापरस्त ताकत के लड़ने
के भरोसे बैठा जाएगा ?
हालत जिस तेज़ी से बदल रहे है उसे देख कर यह कहा जा सकता है कि भारत के मुसलमानों
को सीरिया के नक़्शे कदम पर धकेलने की तैय्यारी पूरी तरह से चल रही है. केंद्र की
सरकार भारतीय मुसलमानों के सलफीकरण और सफविदकरण दोनों ही मुद्दों पर चुप्पी साधे
बैठी है. इस अत्यंत खतरनाक खेल में जीत किसी भी पक्ष की नहीं होगी अगर होगा तो
सर्वत्र विध्वंस जिसमे कोई भी न बचेगा.
अभी समय आ गया है कि भारत
के जनवादी राजनीतिक संगठन इस प्रश्न पर अपनी स्थिती स्पष्ट करे कि क्या सार्वजनिक
जीवन में धर्म आधारित राजनीति को अनुमति दी जानी चाहिए ? या उन्हें शट-अप कह कर घर
बैठने के लिए विवश किया जाए? जाहिर है यह काम क़ानून से नहीं होगा इसके लिए कड़ा
राजनीतिक संघर्ष करने और मज़बूत इच्छा शक्ति की दरकार है. इससे पहले की बहुत देर हो
जाए यह कार्य अतिशीघ्र किया जाना चाहिए. तारेक फतह पर जामिया में हुए इस विवाद ने
मुझे १९९१ में वहां के लुम्पन छात्रों द्वारा प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन के विरोध की
यादे ताज़ा कर दी है जिसे माजूदा विदेश मंत्री
सलमान खुर्शीद का वरदहस्त हासिल था. आज अगर ऐसे मौक़ा परस्त लोग देश के
सत्ता संस्थानों के उच्च पदों पर बैठे है तब उनकी हकुमत से इस्लामी फासीवाद के
विरुद्ध कोई लड़ाई तेज़ हो इस गलत फहमी में कौन रह सकता है?
Friday, March 15, 2013
जमाती फजलुर्रहमान: मानवजाति पर नाजायज़ क़र्ज़
इनसे मिलिए ये हैं पाकिस्तान के मज़हबी नेता मौलाना फ़ज़लुर्रहमान. इनकी पार्टी जमात को एक दहाई सीटे नहीं मिलती, ये खुद कितनी बार चुनाव हारे इसका अंदाजा शायद इन्हें भी नहीं होगा. पिछले २ माह में क्वेटा में दो और एक कराची में धमाके हुए जिनमे सैकड़ो शहरी मारे गए. लेकिन मजाल है कि ये कुछ बोले ? मज़हबी दरिंदो ने खुदकश हमलो में हजारो बेगुनाहों को मौत की नीद सुला दिया- मजाल है कि ये मौलाना कुछ करे उनके खिलाफ..पाकिस्तान रोज़ एक फिट गर्त में गिर रहा है, मेहनत कश आवाम की दिक्कते हर रोज़ एक पहाड़ की तरह उनके सामने होती है लेकिन मौलान ने कभी बुनियादी मसलो पर लड़ाई शुरू करने की जुर्रत नहीं की. इनका नाम मौलाना 'डीज़ल' भी है जो इनकी हराम खोरी का अपने आप में जीता जागता दस्तावेज है, इनकी पार्टी को जमाते हरामी के नाम से भी कुछ लोग जानते है.
हां, इन्हें दिल्ली में दी गयी अफ़ज़ल गुरु की फांसी याद आ गयी, पाकिस्तान की संसद में भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने वाले यही वह महान शख्सियत है जिसके कर्ज के नीचे मुसलमान और मानव जाति दबी हुई है. इन्हें शर्म नहीं आती, कब तक जज्बाती सियासत करके जनता का गला घोटते रहेंगे? इन सभी मजहबी बहरूपियो का चरित्र एक ही होता है, असली मुद्दों से जनता को दूर रखा कर नकली मुद्दों की तरफ जनता का ध्यान बाँट देना.
गौर करने वाली बात है उधर के दाहिने बाजू सियासत का जवाब इधर के दाहिने बाजू संघियों ने फ़ौरन दिया, पाकिस्तान के 'निंदा प्रस्ताव' की 'निंदा' भारतीय संसद ने भाजपा द्वारा लाये एक प्रस्ताव में कर दी.....धन्य हो लोकतंत्र जो कैसे कैसे जीवों की जीवन दे देता है? खासकर तीसरी दुनिया के देशो में.
हां, इन्हें दिल्ली में दी गयी अफ़ज़ल गुरु की फांसी याद आ गयी, पाकिस्तान की संसद में भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने वाले यही वह महान शख्सियत है जिसके कर्ज के नीचे मुसलमान और मानव जाति दबी हुई है. इन्हें शर्म नहीं आती, कब तक जज्बाती सियासत करके जनता का गला घोटते रहेंगे? इन सभी मजहबी बहरूपियो का चरित्र एक ही होता है, असली मुद्दों से जनता को दूर रखा कर नकली मुद्दों की तरफ जनता का ध्यान बाँट देना.
गौर करने वाली बात है उधर के दाहिने बाजू सियासत का जवाब इधर के दाहिने बाजू संघियों ने फ़ौरन दिया, पाकिस्तान के 'निंदा प्रस्ताव' की 'निंदा' भारतीय संसद ने भाजपा द्वारा लाये एक प्रस्ताव में कर दी.....धन्य हो लोकतंत्र जो कैसे कैसे जीवों की जीवन दे देता है? खासकर तीसरी दुनिया के देशो में.
Saturday, March 9, 2013
इस्लामी गुंडों का कानून है ईश निंदा कानून
ये इक्कसवी सदी की कितनी खूबसूरत तस्वीरे है? एक लफंगे ने कहा कि 'उसने हुज़ूर की शान में गुस्ताखी की है', सारे लफंगों के होश उड़ गए. लफंगों का हुजूम 'नारा -ए-तकबीर-अल्लाहु अकबर' लगाता हुआ भंगियो (पाकिस्तान में सफाई कर्मचारी इसाई है; ६५ साल में भी ये मुसलमान क्यों नहीं हुए यहाँ अलग बहस का मौजू है) के मुहल्ले, जोसेफ कालोनी लाहौर पाकिस्तान में उस कथित अपराधी बब्बी को ढूंढने निकल पड़ा, वो नहीं मिला तो उसकी जात-बिरादरी-धर्म के लोगों के कोई १५० घरो को जला दिया. इन सुहानी तस्वीरो में, तबाही पर ताडंव नृत्य करते 'मज़हब के रखवालो' को साफ़-साफ़ पहचाना जा सकता है.
राजनीतिक इस्लाम अगर एक फासीवादी विचारधारा है तो 'ईश निंदा' उसका प्रमुख अस्त्र है. ऐसे बर्बर कानून की जरुरत उन बर्बर ताकतों को होती है जिन्हें ये नज़ारे देखने में अच्छे लगते है और जिन्हें अपनी इन्ही शैतानी कार्यवाहियों को हर रोज़ अंजाम देने की इच्छा रहती है. पाकिस्तान में ये अनासिर अब तकरीबन हर घर में मौजूद है. भारत में भी अब इनकी तादाद अच्छी खासी बढ़ रही है. एक कथित बहुजन स्वामी नेता की मूढ़ता की परिकाष्ठा उसके बैनर पर 'इस्लामवाद जिंदाबाद' के नारे तक मे देखी जा सकती है.
ये आग ...मेरे और आपके दरवाज़े पर कल पहुँच जाए तो ताज्जुब न कीजियेगा..सऊदी अरब का पैसा मस्जिदों-मदरसों के जरिये सड़क पर आतंक के रूप में एक 'सलफी' सच्चाई को बयान कर रहा है.
राजनीतिक इस्लाम अगर एक फासीवादी विचारधारा है तो 'ईश निंदा' उसका प्रमुख अस्त्र है. ऐसे बर्बर कानून की जरुरत उन बर्बर ताकतों को होती है जिन्हें ये नज़ारे देखने में अच्छे लगते है और जिन्हें अपनी इन्ही शैतानी कार्यवाहियों को हर रोज़ अंजाम देने की इच्छा रहती है. पाकिस्तान में ये अनासिर अब तकरीबन हर घर में मौजूद है. भारत में भी अब इनकी तादाद अच्छी खासी बढ़ रही है. एक कथित बहुजन स्वामी नेता की मूढ़ता की परिकाष्ठा उसके बैनर पर 'इस्लामवाद जिंदाबाद' के नारे तक मे देखी जा सकती है.
ये आग ...मेरे और आपके दरवाज़े पर कल पहुँच जाए तो ताज्जुब न कीजियेगा..सऊदी अरब का पैसा मस्जिदों-मदरसों के जरिये सड़क पर आतंक के रूप में एक 'सलफी' सच्चाई को बयान कर रहा है.
Monday, February 18, 2013
मुल्लाह बनाम केंचुआ Mullah V/s Earthworm
मुल्लाह, साधु, पंडित,
पादरी आदि का मौजूदा मानव समाज के
रचनात्मक विकास में केंचुए के योगदान से भी कम है. वह मिट्टी की उर्वरा को उन्नत
ही नहीं करता वरन हजारो पक्षियों का पसंदीदा भोजन भी है. ओरगेनिक खेती ने केंचुओ
की महत्ता को और अधिक स्थापित कर दिया है. पर्यावरण के संतुलन को कायम रखने में
केंचुए की महती भूमिका है. लेकिन मुल्लाह, साधु, पादरी या पंडा इनका समाज के विकास
में क्या योगदान है? इनके जीवन से क्या किसी देश की मिट्टी कभी उर्वरक हुई है ?
क्या किसी देश के सकल उत्पाद में इनका कोई योगदान है? ये मात्र परजीवी है,
फिलीपींस से लेकर अमेरिका जहां भी ये प्रजाति पायी जाती है इनके श्रम से कोई रचनात्मक
उत्पादन कभी नहीं हुआ, इनसे बेहतर पृथ्वी पर केंचुए हैं जो इंसान के लिए एक बेहतर
वातावरण तैयार करने में रात दिन जुटे हुए है. एक प्रबुद्ध समाज दाढ़ी की लम्बाई/तिलक
की चौढ़ाई को के बरक्स उस व्यक्ति की आर्थिक उपादेयता और उसके सामाजिक सरोकारों को महत्व
देगा. मुल्लाह-पंडित-पादरी पालने से बेहतर है केंचुओ को पाला जाए, वह हर मायने में
ज़्यादा मुफीद साबित होगा.
Beautiful
earth worm is more productive than Mullah, Sadhu, Pastor or Pundit. It not only
enriches the soil but most liked staple food for thousands of bird species.
Organic farming has reinforced the importance of earth worm. Earth worm plays a
vital role in maintaining the ecological balance of our planet. But what is the
positive contribution of these Mullah, Pastors, Sadhus and Pundit in our social
development? Has their presence ever improved the productivity of the soil in
any country? Do they contribute anything in GDPs of any nation? They are just
parasites. From Philippine to United States wherever they are found, has never
contributed anything productive so far. I rate an earth worm better than these
parasites that are creating positive conditions for human life. A just society
will always recognise the services of a human being in terms of his economic
and social contribution not by the length of his beard or wide Tilak at
forehead. It would always be a better idea to pet few earth worms rather than
giving alms to parasites of the society.
फोटो सौजन्य :
गूगल/ Photo arrangements: Google
Wednesday, January 2, 2013
अकबरुद्दीन औवेसी :भारतीय राज्य को चुनौती देता ठाकरे का मुस्लिम संस्करण
हबीबे मिल्लत 42 साला विधायक अकबरुद्दीन औवेसी पुत्र मरहूम सांसद सालारे मिल्लत सलाहुद्दीन औवेसी इन दिनों अपनी जज़्बाती ठाकरे अंदाज़ वाली तकरीर के कारण भारतीय मीडिया, सोशल मीडिया की सुर्खियों में हैं। 24 दिसंबर को आदिलाबाद में कोई 10-15 हजार मुसलमानों की भीड़ को संबोधित करने के बाद मुसलमानों के प्यारे (हबीबे मिल्लत ) ने इलाज कराने के नाम पर लंदन का जहाज पकड़ लिया। नेता,मीडिया, सरकार, भाजपा, अदालत सब हरकत में आ चुके हैं। अकबरुद्दीन की ही माने तो भारत में 25 करोड़ मुसलमान है इनकी सियासी जमात इत्तेहादे मुसलमीन (एम आई एम ) के कुल जमा 7 विधायक हैं और इनके बड़े भाई असद्दुदीन अपने पिता सलाहुद्दीन की पुश्तैनी संसदीय सीट से भारतीय लोकसभा के निर्वाचित सांसद भी हैं। हैदराबाद से सलाहुद्दीन औवेसी 6 बार सांसद रहे जिनका स्वर्गवास 2008 में 77 साल की उम्र में हुआ था। अब आप इन सालारे मिल्लत, हबीबे मिल्लत की सियासी औकात का अंदाजा खुद ही लगा सकते हैं।
मुसलमानों के इस अशरफ नेता, इनकी सियासी तंजीम के इतिहास का परिचय करना यहाँ आवश्यक है, अतीत से वर्तमान को समझने में पाठकों को आसानी होगी। हैदराबादी मजलिस का इतिहास भारत की आज़ादी से भी पुराना है। भारत की आज़ादी से पूर्व निजाम हैदराबाद उस समय भी दुनिया का सबसे अमीर आदमी था। निज़ाम हकुमत की अपनी रेलवे, डाक सेवा, संचार, जहाज रानी, एयरलाइन फ़ौज थी। हकुमत की जी डी पी बेल्जियम के बराबर थी।निज़ाम के पास 22,000 फौजियों की सेना थी जिसमे अरब,पठान, रोहिल्ले आदि शामिल थे। निज़ाम ने भारत में विलय करने से इंकार कर दिया था सितम्बर 1948 तक कई वार्ताओं के दौर चले लेकिन निज़ाम टस से मस न हुए। निज़ाम की निजामशाही के खिलाफ़, उसके जमीदारों के खिलाफ आज़ाद भारत में आम जनता का पहला संगठित विद्रोह हुआ जिसका नेतृत्व भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने किया था। उन दिनों मजलिस हुआ करती थी जिसका नेता कासिम रिज़वी था। भाड़े के सैनिकों को रखने में माहिर निजाम की हकुमत बचाने (इस्लाम की हिफ़ाजत पढ़े) के लिए कासिम ने निजाम के आदेश पर एक मिलिश्या का गठन किया जिसे 'रजाकार' के नाम से जाना जाता है। इसकी तादाद उन दिनों 2 लाख तक बतायी जाती है। आम मुस्लिम आबादी पर कासिम की पकड़ भी इस संगठन के जरिये समझी जा सकती है। उस ज़माने में कासिम की तकरीरें और अकबरुद्दीन की तकरीरों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है, बस कुछ तात्कालिक मुद्दे और जुड़ गए हैं। कासिम रिज़वी ने रजाकारों को भारतीय फौजों के खिलाफ लड़ने के लिए वही दलीलें दी थी जो अकबरुद्दीन ने दी है। बारहाल निज़ाम की हकुमत को 17 सितंबर 1948 में पांच दिन का भारतीय फ़ौजी अभियान 'आपरेशन पोलो' उर्फ़ पुलिस एक्शन के सामने घुटने टेक देने पडे। निजाम के अरब कमांडर अल इदरूस को जनरल चौधरी के सामने समर्पण करना पड़ा। इस लड़ाई में भारत के 32 फ़ौजी मरे, निजाम की तरफ से मरने वालो की संख्या 1863 बतायी गयी लेकिन उन हालात में हुई व्यापक हिंसा में मरने वालों की संख्या विभिन्न इतिहासकारों के माध्यम से 50 हजार से दो लाख तक बताई जाती है।
उपरोक्त जानकारियाँ उन लोगों के लिये विशेषकर गौर तलब है जो अकबरुद्दीन के सियासी काफिले को अखिल भारतीय स्वरुप देने की हसरतें पाले बैठे हैं। उन्हें इतिहास के इस पाठ से यह सबक लेना होगा की तत्कालीन निज़ाम और उसकी फ़ौज, उसके संसाधन एक बालक राज्य भारत की फ़ौजी कार्यवाही पांच दिन न झेल सका, अब न निजाम है न उसकी फौज़ बस अकबरुद्दीन के लम्पटई तक़रीरें है और उधर भारत एक विशाल सैन्य शक्ति है अब मुकाबला कैसे होगा ? जंग तकरीरों से नहीं हथियारों से लड़ी जाती है लेकिन अकबरुद्दीन जैसे नेता अनपढ़ और मासूम आवाम को गुमराह करते रहे है। अकबरुद्दीन औवेसी की शक्ल में कासिम रिज़वी की विरासत हैदराबाद में अभी ज़िंदा है। शुक्र है कि आंध्र से बाहर अभी मजलिस को कोई मुसलमान घास नहीं डालता।
अकबरुद्दीन अपने भाषण में अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते नहीं थकते। कोई भी पहली दफा सुनने वाला यह अनुमान लगाएगा कि उन्हें गोली मारने वाला शायद कोई हुकूमत का आदमी होगा। गोली शरीर में होने के किस्से इतने भावनात्मक तरीके से बुने गए जैसे सुनने वालों को लगे कि कौम की किसी जंग में अकबरुद्दीन को 3 गोली लगी, अभी एक गोली बाहर आना बाकी है। मंच से बार-बार कुरआन शरीफ,मौहम्मद का वास्ता देने , नमाज पढ़ने की ताकीद देने वाले इस शख्स की दुश्मनी किसी सरकार से नहीं न किसी गैर मुस्लिम से। मौहम्मद पहलवान नाम के एक शख्स से इनकी जमीन जायदाद को लेकर रंजिश है, उसी सिलसिले में मई 2011 में हुए एक कातिलाना हमले में अकबरुद्दीन ने कौम की खातिर गोलियाँ खाई थी। तब बच्चा-बच्चा इनके लिये रोया, नमाजे पढी काबे में, करबला में दुआएं हुई और तब जाकर हबीबे मिल्लत अकबरुद्दीन की जान बची। न सुनने वाले को शर्म है न कहने वाले को हया है। सच किसी तलवार की तरह सामने है बस थोड़ा तथ्यों पर गौर करना होगा और खुद बा खुद झूठ काफूर हो जायेगा।
अकबरुद्दीन अपने वाहियात तेवरों से पहले भी चर्चा में आ चुके है। तसलीमा नसरीन की हैदराबाद में मुखालफत करने,रुश्दी पर लगे फतवे को लागू करने के मजलिसी फरमान को वह पहले सार्वजनिक कर चुके हैं। जाहिर हैं ऐसे जज्बाती मुद्दों पर आम मुसलमान बहुत खुश होता है, उसकी खुशियों में चार चाँद लगाने के लिए उर्दू प्रैस ऐसे सवालों को हमेशा ज़िंदा रखती है और इन अखबारों को अकबरुद्दीन जैसा आदमी बिकवाने में मदद करता है। जो मुद्दा मुद्दा नहीं होता वह मुसलमानों के जहन में एक बड़ा सवाल बना दिया जाता है। इन बनावटी मुद्दों पर मजलिस जैसी जमाते चुनाव जीत जाती है। इक्कीसवीं सदी में इस्लाम के नाम पर सियासत करने वाले का मकान हैदराबाद के सबसे महंगे इलाके बंजारा हिल में है। जब ये श्रीमान तक़रीर दे रहे हैं तब इस बात पर कोई गौर नहीं करता कि स्टेज पर एक भी महिला नहीं है। इनके पिता का इन्तेकाल हुआ संसदीय सीट खाली हुई तब इन्हें पार्टी में कोई दूसरा काबिल इंसान नहीं दिखा। इनके बड़े भाई असदुद्दीन औवेसी आज अपने पिता की जगह संसद में बैठे हैं और खुद अकबरुद्दीन नेता मजलिस आंध्र प्रदेश विधान सभा सदस्य हैं।
मजलिस की चुनावी सफलता के सफ़र का अध्ययन करने पर कोई भी इस नतीजे पर पहुँच सकता है कि इसमें कांग्रेस का कितना बढ़ा हाथ है? कांग्रेस के समर्थन और गठबंधन के बिना मजलिस का विधान सभा में पहुँचना संभव न था। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता ने देश को एक से बढ़कर एक कद्दावर लम्पट नेता दिए हैं।बाला साहब ठाकरे को मुम्बई में उसके आरंभिक दिनों में यदि कांग्रेस का समर्थन न मिला होता तब क्या शिवसेना जैसी ताकत देश के राजनैतिक नक़्शे पर नज़र आती ? आज अकबरुद्दीन आदिलाबाद में जिस बेअदबी के साथ भारतीय इतिहास के छक्के छुडा चुका है क्या वह संभव होता यदि उसके वालिद सलाहुद्दीन को सांसद बनवाने में कांग्रेस ने अतीत में मदद न की होती ?
कांग्रेस के दिशाहीन और मूल्यरहित राजनीतिक व्यवहार ने देश की राजनीति को बहुत नुक्सान पहुँचाया है। केरल में कम्युनिस्टों के खिलाफ मुस्लिम लीग से समझौता करना उसके वैचारिक दिवालियेपन और राजनीतिक अवसरवाद का परिणाम है जिससे देश की दक्षिण पंथी ताकतों को उसपर हमला करने का अवसर मिला बल्कि मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को पैर जमाने का मौक़ा मिला। अकबरुद्दीन की मौजूदा उवाच को मजलिस की राजनीतिक मोलभाव करने की बढी ताकत के रूप में देखा जाना चाहिए। तेलांगना आन्दोलन अपनी परिणिती पर पहुंचने वाला ही है। यह अच्छा समय है जब राज्य में राजनीतिक स्थितियाँ पूरी तरह से तरल है इसी मौके का फ़ायदा उठा कर मजलिस अपने मुस्लिम वोटों का चेहरा दिखाकर मोल भाव का प्रस्ताव रख रही है। जो सबक उसने पिछले दो दशकों में कांग्रेस से सीखा है वह आज उसी पर पलटवार कर रही है।
उपरोक्त राजनीतिक परिदृश्य के अतिरिक्त मुसलमानों से जुडी,मूलभूत समस्याओं को भी नज़ारा अंदाज़ नहीं किया जा सकता। जो प्रश्न अकबरुद्दीन ने उठाये हैं चाहे वह भूमि वितरण का प्रश्न हो या सरकारी आवासों के आबंटन में मुसलमानों के हिस्से का नदारद होना, गंभीर आरोप तो है ही साथ ही राज्य का मुसलमानों के प्रति रवैय्ये को भी स्पष्ट करता है। ये आरोप सरासर झूठे नहीं। भारत की 10 लाख की फ़ौज में मात्र 29 हजार मुसलमानों की सख्यां होना एक इत्तेफाक नहीं बल्कि किसी योजना का हिस्सा ही है। ठीक इसी तरह दूसरे इदारों में उनकी नौकरियाँ का प्रतिशत असामान्य रूप से कम होना। बैंक के कर्जो में, उसके मौहल्लो के विकास, शिक्षण संस्थाओं का आभाव आदि ऐसी समस्याएँ है जिन्हें न तो राज्य पिछले 65 वर्ष में पूरा कर सका बल्कि इन क्षेत्रों में उसे पीछे धकेलने का प्रयास सजग रूप से हुआ है। साम्प्रदायिक दंगों का अर्थशास्त्र भी मुस्लिम समुदाय के वर्ग हितों पर दक्षिण पंथी हमले के रूप में चिन्हित किया जा सकता है। समस्याएं है, बहुत विकट प्रश्नों से जूझ रहे इस समुदाय को अकबरुद्दीन जैसे जहरीले भेडिये के सामने धकेलने में किन परिस्थितियों, दलों, सरकारों और राज्य शक्तियों का हाथ है इसकी पड़ताल की जानी चाहिए। यह वही हैदराबाद है जिसने वामपंथी उम्मीदवार आर एन रेड्डी को नेहरू से भी अधिक वोटों से जीता कर संसद में भेजा था, यह वही हैदराबाद है जिसकी चारमीनार सिगरेट मज़दूरों के नेता मखदूम मोईनुद्दीन चुने गए थे, मखदूम इसी शहर से चुनाव जीत कर विधान सभा में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हुआ करते थे। क्या यह वही भूमि नहीं जिसने राजेश्वर राव जैसे नेता कई बड़े नेता इस देश को दिए।
भारतीय राज्य अपने बहुजनो, अल्पसंख्यकों आदिवासियों के प्रति अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में असफल हुआ है। क्षेत्रीय संप्रभुता को बनाए रखने क नाम पर कभी कश्मीर तो कभी उत्तर पूर्व में अभूतपूर्व शक्ति का प्रयोग करके विभिन्न सामाजिक समूहों को अपने प्रभामंडल से उसने विरक्त किया है। देश की न्यायप्रणाली और उसके राजनीतिक प्रश्रय ने लोकतंत्र का भद्दा मजाक उड़ाते हुए बाल ठाकरे, मोदी, तोगड़िया, आडवानी, सिंघल, ऋतंभरा जैसे खलनायकों को पैदा किया है। अदालतें दोषियों को सजा न दे सकी, अपराधी संसद में राजसत्ता की मलाई चाटते दिखे तब ऐसी निराशा में छत्तीसगढ में आदिवासी अगर हथियार बंद आन्दोलन चला सकते है तब अकबरुद्दीन जैसे अनासिर को नारा इ तकबीर-अल्लाहु अकबर के नारे के साथ राजनीति करने से कौन रोक सकता है?
पूरा देश आज इन तमाम हरकतों को देख रहा है। धर्म का धूर्ततापूर्ण राजनीतिक इस्तेमाल और उसके फायदे -नुकसान आज सभी के सामने है। भगुवा राष्ट्रवाद नरेन्द्र मोदी के विकास की आड़ में दिल्ली कब्जाने की फिराक में लगा है। जो सत्ता में है वह मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को उकसा कर अपनी रोटियाँ सेकने में व्यस्त है। बहुजन स्वामी ताकतें अपनी स्वार्थ सिद्धी में व्यस्त है, जनवादी ताकतें अपनी लगातार हुई हारों के कारण पस्त है, यही सही वक्त है अकबरुद्दीन के लिए जिसने कहा 'जिसकी लाठी उसकी भैंस'. दक्षिण पंथी हिंदुत्व ताकतों ने ठाकरे को चालीस साल जिन्दा रखा, मोदी पिछले 15 साल से ज़िंदा है। अब मुसलमान दक्षिणपंथी ताकतों की बारी है, पहले उनका ईमान दाऊद पर आया, मज़हबी ऐतबार से ज़ाकिर नायक उनका महानायक बनता जा रहा है (सैंकड़ो हिन्दू बाबा बाबी के महा प्रचार तले यह मुस्लिम आफ शाट है) अब सियासी ठाकरे टाईप नेता की कमी थी इस महाशून्य को अशरफी मुसलमान अकबरुदीन औवेसी ने पूरा करने का ऐलान कर दिया है। फिलहाल वह लंदन से पाकिस्तानी मुहाजिर नेता अलताफ हुसैन की भाँती दूर से नज़ारा कर रहा है।
फोटो सौजन्य : गूगल
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